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भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत क्यों गलत हैं?

थल सेनाध्यक्ष विपिन रावत ने बीते दिनों अपने एक इंटरव्यू में कुछ ऐसा कहा जिस पर हंगामा मच गया। सोशल मीडिया में लोग जमकर उनकी आलोचना कर रहे हैं कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत क्यों गलत है? हाँलाकि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में असहमतियों की भी बेहद जरूरत होती हैं उसके लिए कई लोग उनके पक्ष में भी खड़े नजर होते आ रहे हैं। वे व्यावहारिक दृष्टिकोण से भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत के बयान का समर्थन कर रहे हैं। दरअसल जनरल विपिन मानना है कि अभी भी परिस्थितियाँ ऐसी नहीं है कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका का समर्थन किया जा सके। उन्हें फ्रंटलाइन पर नियुक्त किया जा सके जहाँ प्राक्सी-वाॅर की संभावनाएँ ज्यादा है।

भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत के तर्क –

जनरल रावत के अपने तर्क हैं, उनके अपने विचार हैं, अनुभव एवं परिस्थितियों साथ ही अंदरखाने की बातों पर वे ज्यादा जानते-समझते हो पर मैं उनके तर्कों से असहमत हुआ साथ ही उनके हर तर्क तार्किकता की कसौटी पर कसकरस अपने मानिसक स्तर पर उसका कांउटर करने का प्रयास किया कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत क्यों गलत हैं?

भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत

तर्क संख्या(1.) भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत कहते हैं कि प्राॅक्सी-वार के समय महिला अधिकारी भी शहीद हो सकती हैं, कैजुएल्टी की संभावनाएँ हैं।

काउंटर – रावत साहब भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका का जिक्र करते हुए शायद यह तथ्य भूल गए कि, सेना में भारतीय महिलाएँ युद्ध भूमिका में या शामिल होने भी अपनी स्वेच्छा से आती हैं, सारे खतरों को जानकर, उनसे वे भँली-भाँति अवगत हैं, एवं आप किसी दुँधमुँही बच्ची को तो युद्ध में भेज नहीं रहे हैं। तो जैसे एक पुरूष सैनिक शहीद होता है। वैसे ही जब महिला सैनिक शहीद हो तो दोनों में अंतर क्या है। यह नारियों को भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका से दरकिनार करने जैसा है।

तर्क संख्या(2.) जनरल रावत कहते हैं भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका में समस्या यह है कि हमारा जवान आज भी गाँव से आता है, वह महिला ऑफिसर को युद्ध भूमिका के अधिकारी के रूप स्वीकार्य नहीं कर पाएगा !!

काउंटर – सर, आदर्श परिस्थितयाँ तो कभी नहीं होती, आप आज भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका जाँचकर, परखकर देखिए, उन्हें आप आज नियुक्त कीजिए। कल को आपका जवान उसे स्वीकार्य करेगा। उस आदर्श समय का इंतजार कब तक कीजिएगा। साथ ही विडंबना तो यह है कि आप यह बात तब कह रहे हैं जब राष्ट्र की सेनाध्यक्ष एक महिला है। अंत में आपके पुरूष जवानों को भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका में लैगिंक आधार पर प्रश्न लगाने का कोई अधिकार नहीं है। उन्हें एक महिला-ऑफिसर का नेतृत्व स्वीकार करना ही होगा वरना यह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एक रूप माना जायेगा।

तर्क संख्या(3.) जनरल रावत कहते हैं कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के समय पीपिंग इश्यू की शिकायत आती है यानि यदि महिला-ऑफिसर को यह शिकायत आई कि कोई उसे झाँक रहा है तो दरअसल वर्तमान कानून यह है कि सेना महिलाओं को एक हट देती हैं, उसके ऊपर रक्षात्मक दोहरी शीट भी लगी होती हैं।

भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका पर जनरल रावत क्यों गलत हैं?

काउंटर – अव्वल तो यही कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के विरोध में यह तर्क संसाधनों की मौजूदगी एवं उसकी व्यवस्था की बात है। पर उससे गहरी बात यह है कि आपने यह बयान देकर कहीं न कहीं अपने पुरूष साथियों को ही अपमानित किया है। यदि आपके कुछ जवानों को किसी महिला को कपड़े बदलते हुए देखने में दिलचस्पी है तो आप ऐसी घृणित सोच के व्यक्ति को सेना में ही क्यों रखना चाहते हैं। गलत हर जगह होता है पर इसका अर्थ यह तो नहीं न कि आप सही को बिल्कुल ही प्रतिबंधित कर दें। बाकी हमें अपने जवानों की शालीनता एवं सभ्यता पर पूरा भरोसा है कि उन्हें मर्यादाओं में रहना आता है एवं वे भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के दौरान उनका सम्मान एवं समर्थन करेगें।

तर्क संख्या(4.) यदि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के समय महिला अधिकारी ने युद्ध के दौरान मातृत्व अवकाश की माँग की तो उस परिस्थिति से कैसे निपटा जाएगा?

काउंटर – सर, कोई भी महिला एक दिन में तो शिशु को जन्म देती नहीं है। उस प्रक्रिया का अपना एक समय है। यदि आपको इस तरह की संभावना नजर आती है तो आप स्वास्थय नियमों के तहत इसकी जाँच कराइए एवं उसके बाद नियुक्ति दीजिए। अव्वल तो आप भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के समय ऐसी व्यवस्थाएँ बनाइए कि महिला खुलकर आपसे इस तरह की बातें बतला सकें !!

तर्क संख्या(5.) भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के दौरान अगर किसी महिला को पाकिस्तानियों ने पकड़ लिया तो हौवा बन जाएगा।

काउंटर – साहब, शहीद सौरभ कालिया से लेकर हेमराज तक के साथ पाकिस्तानियों ने जो बर्बरता की है उससे हम सभी वाकिफ़ है। भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के दौरान भी महिलाएँ इस तरह का खतरा जानती हैं। पर फिर भी उनकी देशभक्ति और राष्ट्र-प्रेम की भावना उन्हें इसके लिए मजबूती देती हैं तो आप उन्हें कैसे इस कर्तव्य-निर्वहन से दरकिनार कर सकते हैं। अव्वल तो यही कि समाज ने महिलाओं की सारी इज्जत उनकी योनि में स्थापित कर दी हैं। यही से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की बुनियाद है।

सर आप इसे समझिए कि इस देश भारतीय महिलाओं को युद्ध भूमिका के दौरान यदि किसी महिला सैनिक के अपहरण हुआ एवं ऐसी हैवानियत सामने आयी एवं बर्बरता हुई या उस पर हुई बर्बरता से भी हमे उतना ही दुख होगा जितना किसी पुरूष सैनिक के साथ यदि हुआ तो। कृपया यह लैंगिक भेदभाव मत कीजिए।

भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका

निष्कर्ष –

अंत में भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका के संदर्भ में यदि बात की जाए तो हमारी विशुद्ध भारतीय संस्कृति महिला योद्धाओं के गौरवशाली नाम से गुंजायमान है। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का जिक्र हो, महिला योद्धाओं की इसी मजबूत परंपरा को आगे बढाते हुए नाम आता है, अहिल्याबाई होल्कर का। बेगम हजरत महल का, साथ ही आधुनिक भारत इतिहास में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की झाँसी रेजिमेंट की महिला सदस्य चाहे वो मुनियम्माह हो, अंजली हो या फिर अम्मालू। यहाँ यह तथ्य भी ध्यान रखना चाहिए कि चंद्रगुप्त के दरबार का जिक्र हो या हैदराबाद के निजाम का दोनों ही जगहों पर महिला सैनिकों पर अधिक भरोसा किया जाता था एवं उनकी मौजूदगी भी रहती थी।

तो जनरल रावत को समझना चाहिए कि भारतीय महिलाओं की युद्ध भूमिका से जाहिर देशभक्ति के लिए उम्र, राष्ट्रीयता, जाति या लिंग के सभी बंधन बेमानी एवं अतार्किक है।

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